Vidisha लम्पी स्किन डिसीज से गौवंशीय व भैंसवंशीय पशुओं की सुरक्षा व बचाव के उपाय

पशु पालन एवं डेयरी विभाग के उप संचालक डॉ ओपी गौर ने जिले के पशुपालकों से की अपील

स्वास्तिक न्यूज़ पोर्टल @ विदिशा मध्यप्रदेश रमाकांत उपाध्याय / 9893909059

पशु पालन एवं डेयरी विभाग के उप संचालक डॉ ओपी गौर ने जिले के पशुपालकों से अपील की है कि अपने गौवंशीय वह भैंसवशीय पशुओं को लम्बी स्किन डिसीज बीमारी से बचाव के लिए जो सुरक्षा व उपाय बताए जा रहे हैं उनका पालन करें। यदि कोई पशुधन बीमारी से ग्रस्त हो जाता है तो उसका शीघ्र उपचार कराएं।
उपसंचालक डॉ  गौर ने बताया कि लम्पी स्किन डिसीज पशुओं की एक वायरल बीमारी है, जो कि पॉक्स वायरस द्वारा पशुओं में फैलती है। यह रोग मच्छर काटने वाली मक्खी एवं टिक्स आदि से एक पशु से दूसरे पशुओं में फैलती है।
इस रोग के शुरूआत में हल्का बुखार दो से तीन दिन के लिए रहता है, उसके बाद पूरे शरीर के चमड़ी में गठानें (2-3 सेमी) निकल आती है। यह गठान गोल उभरी हुई होती है जो कि चमड़ी के साथ-साथ मांसपेशियों की गहराई तक जाती है इस बीमारी के लक्षण मुख, गले, श्वांस नली तक फैल जाती है, साथ ही लिंफ नोड में सूजन, पैरों में सूजन, दुग्ध उत्पादकता में कमी कई सप्ताह तक बनी रहती है। मृत्यु दर 1-5 प्रतिशत है, किन्तु संक्रामकता की दर 10-20 प्रतिशत रहती है। संक्रमित पशु की पहचान चमड़ी की गठानों के आधार पर की जाती है।
सुरक्षा एवं बचाव के उपाय
संक्रमित पशु को स्वस्थ पशु से तत्काल अलग करना चाहिए। संक्रमित पशु को स्वस्थ पशु के झुण्ड में शामिल नहीं करना चाहिए। संक्रमित क्षेत्र में बीमारी फैलाने वाली वेक्टर (मक्खी मच्छर आदि) के रोकथाम हेतु आवश्यक कदम उठाया जाना चाहिए। संक्रमित क्षेत्र से अन्य क्षेत्रों में पशुओं के आवागमन को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। संक्रमित क्षेत्र के बाजार में पशु बिक्री, पशु प्रदर्शनी, पशु संबंधित खेल आदि पूर्णतः प्रतिबंधित करना चाहिए।
संक्रमित पशु प्रक्षेत्र, घर आदि जगहों पर साफ सफाई, जीवाणु व वीषाणुनाशक रसायन (जैसे 20 प्रतिशत ईथर, क्लोरोफार्म, फार्मेलीन (1 प्रतिशत), फिनाइल (2 प्रतिशत), सोडियम हाइपोक्लोराइट (3 प्रतिशत), आयोडिन कंपाउंड (1ः33), अमोनियम कम्पाउंड आदि से किया जाना चाहिए।
पशु संक्रमित होने पर तत्काल निकटस्थ पशु चिकित्सा संस्था को सूचित किया जाना चाहिए। संक्रमित पशुओं का उपचार पशु चिकित्सक के निर्देश पर ही किया जाना चाहिए। संक्रमित पशु की मृत्यु होने पर जैव सुरक्षा मानक के अनुसार डिस्पोज किया जाना चाहिए। संक्रमित दुधारू पशु के दूध का उपयोग जहां तक हो न किया जावे, यदि आवश्यक हो तो उबालकर ही किया जावे।