Rishikesh योगिनी एकादशी व्रत कथा पूजन विधि – पं. देव उपाध्याय

स्वास्तिक न्यूज़ पोर्टल @ ऋषिकेश उत्तराखंड रमाकांत उपाध्याय / 9893909059

(ऋषिकेष के विद्वान पंडित देव उपाध्याय जी से जानिए योगिनी एकादशी का महत्व)
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आषाढ़ मास के कृष्‍ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस वर्ष योगिनी एकादशी का व्रत 24 जून शुक्रवार को रखा जाएगा।

मान्‍यता है कि योगिनी एकादशी का व्रत करने से व्रती को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। साथ ही वह इस लोक के सुख भोगते हुए स्‍वर्ग की प्राप्‍ति करता है। पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार योगिनी एकादशी का व्रत करने से 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने का पुण्य प्राप्त होता है।

योगिनी एकादशी की तिथि और शुभ मुहूर्त
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एकादशी तिथि प्रारंभ? 23 जून रात्रि 09 बजकर 40 मिनट से।

एकादशी तिथि समाप्त? 24 जून रात्रि 11 बजकर 11 मिनट तक।

व्रत पारण का समय? 25 जून , सुबह 5 बजकर 40 मिनट से 8 बजकर 05 मिनट तक।

योगिनी एकादशी की पूजा विधि
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योगिनी एकादशी के उपवास की शुरुआत दशमी तिथि की रात्रि से ही हो जाती है। व्रती को दशमी तिथि की रात्रि से ही तामसिक भोजन का त्याग कर सादा भोजन ग्रहण करना चाहिये और ब्रह्मचर्य का पालन अवश्य करें। हो सके तो जमीन पर ही सोएं। प्रात:काल उठकर नित्यकर्म से निजात पाकर स्नानादि के पश्चात व्रत का संकल्प लें। फिर कुंभस्थापना कर उस पर भगवान विष्णु की मूर्ति रख उनकी पूजा करें। भगवान नारायण की मूर्ति को स्नानादि करवाकर भोग लगायें। पुष्प, धूप, दीप आदि से आरती उतारें। पूजा स्वंय भी कर सकते हैं और किसी विद्वान ब्राह्मण से भी करवा सकते हैं। दिन में योगिनी एकादशी की कथा भी जरुर सुननी चाहिये। इस दिन दान कर्म करना भी बहुत कल्याणकारी रहता है। पीपल के पेड़ की पूजा भी इस दिन अवश्य करनी चाहिये। रात्रि में जागरण करना भी अवश्य करना चाहिये। इस दिन दुर्व्यसनों से भी दूर रहना चाहिये और सात्विक जीवन जीना चाहिये।

योगिनी एकादशी व्रत कथा
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पौराणिक कथा के अनुसार एक बार धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण से एकादशियों के व्रत का माहात्म्य सुन रहे थे. उन्होंने भगवान श्री कृष्ण से कहा, “भगवन! आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या महत्व है और इस एकादशी का नाम क्या है?” भगवान श्री कृष्ण ने कहा, “हे राजन! इस एकादशी का नाम योगिनी है. समस्त जगत में जो भी इस एकादशी के दिन विधिवत उपवास रखता है, प्रभु की पूजा करता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं. वह अपने जीवन में तमाम सुख-सुविधाओं, भोग-विलास का आनंद लेता है और अंत काल में उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. योगिनी एकादशी का यह उपवास तीनों लोकों में प्रसिद्ध है.” तब युद्धिष्ठर ने कहा, “प्रभु! योगिनी एकादशी के महत्व को आपके मुखारबिंद से सुनकर मेरी उत्सुकता और भी बढ़ गई है कृपया इसके बारे थोड़ा विस्तार से बताएं.” इस पर भगवान श्री कृष्ण ने कहा, “हे धर्मश्रेष्ठ! मैं पुराणों में वर्णित एक कथा सुनाता हूं उसे ध्यानपूर्वक सुनना.” स्वर्गलोक की अलकापुरी नामक नगरी में कुबेर नाम के राजा राज किया करते थे. वह बड़े ही धर्मी राजा थे और भगवान शिव के उपासक थे. आंधी आये तूफान आए कोई भी बाधा उन्हें भगवान शिव की पूजा करने से नहीं रोक सकती थी. भगवान शिव के पूजन के लिए हेम नामक एक माली फूलों की व्यवस्था करता था. वह हर रोज पूजा से पहले राजा कुबेर को फूल देकर जाया करता. हेम अपनी पत्नी विशालाक्षी से बहुत प्रेम करता था, वह बहुत सुंदर स्त्री थी. एक दिन क्या हुआ कि हेम पूजा के लिये पुष्प तो ले आया लेकिन रास्ते में उसने सोचा अभी पूजा में तो समय है क्यों न घर चला जाए. फिर उसने अपने घर की राह पकड़ ली।

घर आने बाद अपनी पत्नी को देखकर वह कामासक्‍त हो गया और उसके साथ रमण करने लगा. उधर, पूजा का समय बीता जा रहा था और राजा कुबेर पुष्प न आने से व्याकुल हुए जा रहे थे. जब पूजा का समय बीत गया और हेम पुष्प लेकर नहीं पंहुचा तो राजा ने अपने सैनिकों को भेजकर उसका पता लगाने के लिए कहा. सैनिकों ने लौटकर बता दिया कि महाराज वह महापापी है, महाकामी है; अपनी पत्नी के साथ रमण करने में व्यस्त था. यह सुनकर तो कुबेर का गुस्सा सांतवें आसमान पर पंहुच गया. उन्होंने तुरंत हेम को पकड़ लाने के लिए कहा. अब हेम कांपते हुए राजा कुबेर के सामने खड़ा था. क्रोधित कुबेर ने कहा, “हे नीच, महापापी! तुमने कामवश होकर भगवान शिव का अनादर किया है. मैं तूझे शाप देता हूं कि तू स्त्री का वियोग सहेगा और मृत्युलोक में जाकर कोढ़ी होगा.”
अब कुबेर के शाप से हेम माली भूतल पर पंहुच गया और कोढ़ग्रस्त हो गया. स्वर्गलोक में वास करते-करते उसे दुखों की अनुभूति नहीं थी, लेकिन यहां पृथ्वी पर भूख-प्यास के साथ-साथ कोढ़ से उसका सामना हो रहा था. उसे उसके दुखों का कोई अंत नजर नहीं आ रहा था. वह एक दिन घूमते-घूमते मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में पंहुच गया. आश्रम की शोभा देखते ही बनती थी. ब्रह्मा की सभा के समान ही मार्कंडेय ऋषि की सभा का नजारा भी था. वह उनके चरणों में गिर पड़ा और महर्षि के पूछने पर अपनी व्यथा से उन्हें अवगत करवाया. अब ऋषि मार्कण्डेय ने कहा, “तुमने मुझसे सत्य बोला है इसलिये मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूं. आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष को योगिनी एकादशी होती है. इसका विधिपूर्वक व्रत यदि तुम करोगे तो तुम्हारे सब पाप नष्ट हो जाएंगे.” अब माली ने ऋषि को साष्टांग प्रणाम किया और उनके बताए अनुसार योगिनी एकादशी का व्रत किया. इस प्रकार उसे अपने शाप से छुटकारा मिला और वह फिर से अपने वास्तविक रूप में आकर अपनी स्त्री के साथ सुख से रहने लगा।

भगवान श्री कृष्ण कथा सुनाकर युधिष्ठर से कहने लगे, “हे राजन! 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के पश्चात जितना पुण्य मिलता है उसके समान पुण्य की प्राप्ति योगिनी एकादशी का विधिपूर्वक उपवास रखने से होती है और व्रती इस लोक में सुख भोग कर उस लोक में मोक्ष को प्राप्त करता है।”

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश…

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश…

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश…

तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतरयामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥ ॐ जय जगदीश…

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश…

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश…

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम रक्षक मेरे।
करुणा हाथ बढ़ाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश…

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश…
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