New delhi ऐसी न्यायिक प्रणाली होनी चाहिए जिसमें सभी के लिए आसान न्याय, त्वरित न्याय और न्याय हो : पीएम

प्रधानमंत्री ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन का उद्घाटन किया

“सरकार न्यायिक प्रणाली में प्रौद्योगिकी की संभावनाओं को डिजिटल इंडिया मिशन का एक अनिवार्य हिस्सा मानती है”: प्रधानमंत्री

“अदालतों में स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है ताकि देश के लोग न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ाव महसूस करें”: प्रधानमंत्री

“राज्य के तीन अंगों के बीच सामंजस्यपूर्ण और समन्वित कामकाज ने पिछले सात दशकों में इस महान राष्ट्र की लोकतांत्रिक नींव को संरक्षित और मजबूत किया है”: भारत के मुख्य न्यायाधीश

“भारत में पूरी दुनिया में सबसे अच्छी निःशुल्क कानूनी सहायता सेवाओं में से एक उपलब्ध है”: भारत के मुख्य न्यायाधीश

“सम्मेलन इस सरकार के मार्गदर्शक सिद्धांतों-सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास” के प्रति हमारी सामूहिक प्रतिबद्धता कोदर्शाता है: किरेन रिजिजू

“न्यायपालिका के लिए बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए केंद्र प्रायोजित योजना का विस्तार”

स्वास्तिक न्यूज़ पोर्टल @ नई दिल्ली रमाकांत उपाध्याय/ 9893909059

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज नई दिल्ली के विज्ञान भवन में राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में भाग लिया। इस अवसर पर उन्होंने एक सभा को संबोधित भी किया। इस अवसर पर भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एन वी रमना, उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति यूयू ललित, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और प्रो एस.पी. सिंह बघेल, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश, उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल उपस्थित थे।

इस अवसर पर अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि हमारे देश में, न्यायपालिका की भूमिका संविधान के संरक्षक की है, जबकि विधायिका नागरिकों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने कहा कि संविधान की इन दोनों शाखाओं का यह संगम और संतुलन देश में प्रभावी और समयबद्ध न्यायिक व्यवस्था का रोडमैप तैयार करेगा। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के 75 वर्षों ने न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को लगातार स्पष्ट किया है। प्रधानमंत्री ने कहा कि आवश्यकता के अनुसार देश को दिशा देने के लिए यह संबंध निरंतर रूप से विकसित हुआ है। इस सम्मेलन को संविधान की सुंदरता की जीवंत अभिव्यक्ति बताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि वह बहुत लंबे समय से सम्मेलन में भागीदारी करते रहे हैं, पहले मुख्यमंत्री के रूप में और अब प्रधानमंत्री के रूप में।

प्रधानमंत्री ने कहा कि 2047 में, जब देश अपनी आजादी के 100 वर्ष पूरे करेगा, तो हम देश में किस तरह की न्यायिक व्यवस्था देखना चाहेंगे? हम अपनी न्यायिक व्यवस्था को इतना समर्थ कैसे बनाएं कि वह 2047 के भारत की आकांक्षाओं को पूरा कर सके, ये प्रश्न आज हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अमृतकाल में हमारा दृष्टिकोण ऐसी न्यायिक प्रणाली का होना चाहिए जिसमें आसान न्याय, त्वरित न्याय और सभी के लिए न्याय हो।

 

प्रधानमंत्री ने जोर देते हुए कहा कि सरकार न्याय दिलाने में देरी को कम करने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है और न्यायिक क्षमता को बढ़ाने और न्यायिक बुनियादी ढांचे में सुधार के प्रयास जारी हैं। उन्होंने कहा कि मामलों के प्रबंधन के लिए आईसीटी को तैनात किया गया है और न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर रिक्तियों को भरने के प्रयास जारी हैं।
प्रधानमंत्री ने न्यायिक कार्य के संदर्भ में शासन में प्रौद्योगिकी के उपयोग के अपने दृष्टिकोण को दोहराया। उन्होंने कहा कि भारत सरकार न्यायिक प्रणाली में प्रौद्योगिकी की संभावनाओं को डिजिटल इंडिया मिशन का एक अनिवार्य हिस्सा मानती है। उन्होंने मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से इसे आगे बढ़ाने की अपील की। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ई-कोर्ट परियोजना आज मिशन मोड में लागू की जा रही है। उन्होंने छोटे शहरों और यहां तक ​​कि गांवों में भी डिजिटल लेन-देन की सफलता का उदाहरण दिया। प्रधानमंत्री ने बताया कि पिछले साल दुनिया में जितने भी डिजिटल लेनदेन हुए, उनमें से 40 प्रतिशत डिजिटल लेनदेन भारत में हुआ। प्रौद्योगिकी के उपयोग के विषय पर प्रधानमंत्री ने कहा कि आजकल कई देशों में कानून विश्वविद्यालयों में ब्लॉक-चेन, इलेक्ट्रॉनिक डिस्कवरी, साइबर सुरक्षा, रोबोटिक्स, एआई और बायोएथिक्स जैसे विषयों को पढ़ाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह हमारी जिम्मेदारी है कि हमारे देश में भी कानूनी शिक्षा इन अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो।

प्रधानमंत्री ने कहा कि अदालतों में स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है ताकि देश के लोग न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ाव महसूस करें और इसमें उनका विश्वास बढ़े। उन्होंने कहा कि इससे लोगों का न्यायिक प्रक्रिया का अधिकार मजबूत होगा। उन्होंने यह भी कहा कि तकनीकी शिक्षा में भी स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है।

प्रधानमंत्री ने जोर देते हुए कहा कि न्यायिक सुधार केवल एक नीतिगत मामला नहीं है बल्कि इसमें मानवीय संवेदनाएं भी शामिल हैं और उन्हें सभी विचार-विमर्शों के केंद्र में रखा जाना चाहिए। आज देश में करीब साढ़े तीन लाख कैदी ऐसे हैं जो विचाराधीन हैं और जेल में हैं। उन्होंने कहा कि इनमें से अधिकांश लोग गरीब या सामान्य परिवारों से हैं। प्रत्येक जिले में जिला न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति होती है, ताकि इन मामलों की समीक्षा की जा सके और जहां भी कानून के तहत संभव हो ऐसे कैदियों को जमानत पर रिहा किया जा सकता है। उन्होंने सभी मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से मानवीय संवेदनशीलता और कानून के आधार पर इन मामलों को प्राथमिकता देने की अपील की।

प्रधानमंत्री ने कहा कि विशेष रूप से स्थानीय स्तर पर अदालतों में लंबित मामलों के निपटारे के लिए मध्यस्थता भी एक महत्वपूर्ण उपकरण है। हमारे समाज में मध्यस्थता के जरिए विवादों के निपटारे की हजारों साल पुरानी परंपरा है। उन्होंने कहा कि आपसी सहमति और आपसी भागीदारी अपने तरीके से न्याय की एक अलग मानवीय अवधारणा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि इसी सोच के साथ सरकार ने संसद में मध्यस्थता विधेयक को एकछत्र कानून के रूप में पेश किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा हम अपनी समृद्ध कानूनी विशेषज्ञता के साथ, मध्यस्थता द्वारा समाधान के क्षेत्र में एक वैश्विक मार्ग-दर्शक बन सकते हैं और इस दिशा में हम पूरी दुनिया के सामने एक मॉडल पेश कर सकते हैं।

मुख्यमंत्रियों और मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए, भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एन.वी. रमना ने कहा कि यह हमारे लिए आपके समृद्ध अनुभव, ज्ञान और प्रज्ञता से सीखने का अवसर है जो आपने सार्वजनिक जीवन में हासिल किया है। उन्होंने कहा कि आप लोगों के साथ सीधे जुड़े हैं। आप में से प्रत्येक अपने तरीके से एक महान राय निर्माता है। संविधान तीन अंगों के बीच शक्तियों को अलग करने अर्थात उनके कामकाज के क्षेत्र को स्पष्ट रूप से रेखांकित करने, उनकी शक्तियों और जिम्मेदारियों को चित्रित करने का प्रावधान करता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र के तीनों अंगों के बीच सामंजस्यपूर्ण और समन्वित कामकाज ने पिछले सात दशकों में इस महान राष्ट्र की लोकतांत्रिक नींव को संरक्षित और मजबूत किया है।
श्री न्यायमूर्ति एन.वी. रमना ने कहा कि यह सम्मेलन हमारे लिए आत्मनिरीक्षण और समाधान पर विचार करने का अवसर है। उन्होंने कहा कि वह न्याय वितरण प्रणाली के भारतीयकरण के प्रबल समर्थक रहे है। भारतीयकरण से तात्पर्य भारतीय आबादी की जरूरतों और संवेदनाओं के अनुरूप प्रणाली को ढालकर इसकी पहुंच में वृद्धि करना है। उन्होंने कहा कि यह एक बहुआयामी अवधारणा है। यह समावेशिता, न्याय तक पहुंच प्रदान करने, भाषा की बाधाओं को दूर करने, व्यवहार और प्रक्रिया में सुधार, बुनियादी ढांचे के विकास, रिक्तियों को भरने, न्यायपालिका की शक्ति बढ़ाने आदि की मांग करती है।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि भारत में ‘न्याय तक पहुंच’ की अवधारणा केवल न्यायालयों के समक्ष प्रतिनिधित्व के लिए अधिवक्ताओं को प्रदान करने से कहीं अधिक व्यापक है। उन्होंने कहा कि उन्हें यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि भारत के पास पूरी दुनिया में सबसे अच्छी निःशुल्क कानूनी सहायता सेवाओं में से एक मौजूद है।

इस अवसर पर केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के इस संयुक्त सम्मेलन का उद्देश्य देश के नागरिकों को समय पर, किफायती और गुणवत्तापूर्ण न्याय देने के तरीकों पर विचार-विमर्श करना है। मंत्री महोदय ने उल्लेख करते हुए कहा कि यह भव्य सभा सरकार के मार्गदर्शक सिद्धांतों-सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास के प्रति हमारी सामूहिक प्रतिबद्धता को दर्शाती है। मंत्री महोदय ने कहा कि यह सम्मेलन न्याय के कुशल वितरण के लिए ठोस समाधान खोजने पर सरकार और न्यायपालिका के बीच एक ईमानदार और रचनात्मक वार्तालाप का यह एक अनूठा अवसर है।

श्री रिजिजू ने बताया कि न्यायपालिका के लिए बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए केंद्र प्रायोजित योजना को 2025-26 तक बढ़ा दिया गया है, जिसमें 5,307 करोड़ रुपये के केंद्रीय हिस्से सहित 9,000 करोड़ का बजटीय परिव्यय हैं।

उन्होंने कहा कि ई-कोर्ट इंटीग्रेटेड मिशन मोड प्रोजेक्ट के तहत देश भर में 18,735 अदालतों को कंप्यूटरीकृत किया गया है ताकि मामलों की ई-फाइलिंग और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई आम आदमी तक पहुंच सके। सुप्रीम कोर्ट 2 लाख से अधिक वर्चुअल सुनवाई के साथ एक वैश्विक मार्ग-दर्शक के रूप में उभरा है। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों ने मिलकर लगभग 1.84 करोड़ वर्चुअल सुनवाई की हैं।

मंत्री महोदय ने कहा ई-कोर्ट परियोजना के तहत एक अन्य महत्वपूर्ण योगदान राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (एनजेडीजी) है, जिसके माध्यम से अधिवक्ता और वादी 20.23 करोड़ से अधिक मामलों की स्थिति की जानकारी और इन अदालतों से संबंधित 17.22 करोड़ आदेश/निर्णय प्राप्त कर सकते हैं। डेटा को एक-दूसरे से जुड़ी अदालतों द्वारा वास्तविक समय के आधार पर अपलोड किया जाता है।

उन्होंने कहा कि देश में ई-कोर्ट परियोजना की एक और ऐतिहासिक उपलब्धि वर्चुअल कोर्ट की स्थापना है। 13 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 17 वर्चुअल अदालतें कार्यरत हैं जो मुख्य रूप से छोटे यातायात अपराधों से निपटती हैं। इन अदालतों ने लगभग 1.39 करोड़ मामलों को शामिल किया है और 236.88 करोड़ रुपये ऑनलाइन जुर्माने (1 अप्रैल 2022 तक) के रूप में वसूल किए हैं। मंत्री महोदय ने बताया कि पर्यावरण के अनुकूल होने के अलावा मामलों का निपटारा कागज रहित तरीके से किया जाता है, इससे न्यायिक जनशक्ति की बचत हुई है और नागरिकों की सुविधा में इजाफा हुआ है।

उन्होंने कहा कि वाणिज्यिक मामलों के त्वरित समाधान के लिए वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 पारित किया गया और 2018 में फिर से संशोधित किया गया, जिसके कारण दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरु में पहली बार “समर्पित वाणिज्यिक न्यायालय” की स्थापना हुई। इस बैठक के एजेंडे के हिस्से के रूप में, यह प्रस्तावित है कि 500 ​​से अधिक वाणिज्यिक विवाद लंबित होने की स्थिति में, राज्य सरकारें इसके लिए 1 (एक) समर्पित वाणिज्यिक न्यायालय स्थापित करने पर विचार कर सकती हैं। ऐसे मामलों में जहां 500 से कम वाणिज्यिक विवाद लंबित हैं, वाणिज्यिक मामलों के कुशल और समय पर निपटान में सहायता के लिए नामित वाणिज्यिक न्यायालयों की स्थापना पर विचार किया जा सकता है।

मंत्री महोदय ने बताया कि न्याय विभाग देश के हर जिले में प्रशिक्षित वकीलों के माध्यम से टेली-लॉ सेवाओं के विस्तार की सुविधा के लिए एनएएलएसए के साथ एक समझौता कर रहा है और इसके लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से दूरस्थ स्थलों तक पहुंचने में अपना पूरा समर्थन देने का अनुरोध किया गया है।