Ujjain सम्राट विक्रमादित्य भवन सम्पूर्ण समाज के विकास का केन्द्र बने – आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत जी

स्वास्तिक न्यूज़ पोर्टल @ उज्जैन मध्यप्रदेश रमाकांत उपाध्याय / 9893909059


विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान द्वारा संचालित विद्या भारती मालवा के प्रशिक्षण, शैक्षिक अनुसंधान केन्द्र एवं प्रांतीय कार्यालय ‘‘सम्राट विक्रमादित्य भवन’’ का लोकार्पण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख प. पू. सरसघंचालक डॉ. मोहन भागवत जी के करकमलों तथा श्री श्री 108 श्री महंत श्यामगिरी जी महाराज (राधे-राधे बाबा) तथा  पवन जी सिंघानिया (मैनेजिंग डायरेक्टर, मोयरा सरिया, इन्दौर) के विशेष आतिथ्य एवं  डी. रामकृष्ण राव जी (अखिल भारतीय अध्यक्ष, विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान) की अध्यक्षता में संस्था के डॉ. कमलकिशोर चितलांग्या (अध्यक्ष, सरस्वती विद्या प्रतिष्ठान मालवा) एवं श्री नरेन्द्र पालीवाल (अध्यक्ष, ग्राम भारती समिति मालवा) की उपस्थित में सम्पन्न हुआ।

प. पू. सरसघंचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने उदबोधन में कहा कि ‘‘सम्राट विक्रमादित्य भवन’’ का निर्माण सभी के लिए आनन्दायी है। शिक्षा एवं स्वास्थ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज व्यक्ति किराये का मकान लेकर भी बच्चो को शिक्षा देता है। विद्या भारती वर्तमान शिक्षा के साथ बच्चों को कुछ और भी सिखाती है तथा सम्म्पूर्ण शिक्षा देने का प्रयास करती है। पशु पक्षी भी अपना जीवन चलाने के लिए ज्ञान प्राप्त करते है, किन्तु उनके सीखने की सीमा होती है। मनुष्य के सीखने की कोई सीमा नही हाती मनुष्य देवता भी बन सकता है। रावण भौतिक व आध्यात्मिक क्षेत्र की विद्याओं का ज्ञाता था किन्तु उसके समाज विरोधी होने के कारण आज भी भगवान श्री राम की ही पूजा होती है। सोने की लंका से अयोध्या अच्छी मानी जाती है। पश्चिम के लोग मानते हैं कि मनुष्य सृष्टि का उपभोगकर्ता है। हमारा मानना है कि अपनी गुणवत्ता का उपयोग सब के लिये हो।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 मनुष्य को सबके लिये उपयोगी बनाना चाहती है, उपद्रवी नहीं। विद्या भारती का लक्ष्य स्पष्ट है अपने गुणो के साथ सब का विकास करना ।

साधन अनुकुल सत्व के आधार पर ही लक्ष्य की प्राप्ति सम्भव है। आचार्यो को प्रशिक्षित करने से ही शिक्षा का लक्ष्य प्राप्त कर सकते है। सीखने वाले के स्तर पर जा कर ही सीखने की प्रेरणा दी जा सकती है। छोटे बच्चो के रोने पर प्रोफेसर द्वारा फिजिक्स की बड़ी बाते करने से वह चुप नहीं हो सकता, उसे तो रोचक तरीके से कुछ बताने पर ही चुप कराया जा सकता है।

शिक्षक के व्यवहार के बारे में बोलते हुए माननीय ने कहा़ कि अलग-अलग स्तर पर शिक्षा देते हुए संतुलित व्यवहार प्रयोग सिद्ध प्रत्यक्ष प्रचलन दिखना आवश्यक है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार हमें आधुनिक तकनीक का उचित उपयोग करते हुए, साथ ही अपनी दिशा और लक्ष्य को न भुलते हुए अगली पीढ़ीयों का निर्माण करना है। एक बंगाली कविता का उल्लेख करते हुए उन्होने कहाँ ‘‘विधि तोहे छोडबे ना‘‘ अर्थात यदि तुम दिशा और सही तरीका नहीं छोड़ोगे तो तुम्हारा भाग्य तुम्हें कभी नहीं छलेगा।


मा. मोहन जी भागवत ने सम्राट विक्रमादित्य भवन को केवल विद्या भारती ही नहीं अपितु सामाजिक विकास का केन्द्र बनाने कि बात कहीं। उन्हाने कहाँ की इस प्रोजेक्ट पर समाज को अपनी छत्र छाया बनाये रखना होगी।