भारत की संस्कृति व सभ्यता की रक्षा के लिए हिन्दुओं का संगठित होना आवश्यकः जगद्गुर शंकराचार्य शारदानंद सरस्वती महाराज

देशभर से आए साधु संतों ने वेदांत आश्रम में की अमृत वर्षा, दिखाए करतब,  नौ दिवसीय रामकथा का हुआ समापन

स्वास्तिक न्यूज़ पोर्टल @ गंजबासौदा मध्यप्रदेश रमाकांत उपाध्याय/

जीवाजीपुर स्थित वेदान्त आश्रम में आयोजित नवदिवसीय श्री लक्ष्मीनारायण महायज्ञ एवं श्री राम कथा के समापन दिवस पर सन्त सम्मलेन का आयोजन किया गया। जिसमें वृन्दावन, हरिद्वार, हिमालय, चित्रकूट, भोपाल व वाराणसी के अतिरिक्त देश के विभिन्न क्षेत्रों से साधु संतों का आगमन हुआ। 

वेदांत आश्रम में आयोजित संत सम्मलेन में हिमालय कांगड़ा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य श्री शारदानंद सरस्वती महाराज ने वेदों में वर्णित धर्म के व्यापक स्वरूप को वर्णित किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्र और धर्म दो अलग-अलग चीजें नहीं हैं। हमें अपनी राष्ट्र की रक्षा के लिए धार्मिक संकीर्णताओं को त्यागकर आगे बढ़ना चाहिए। भारत की सभ्यता व संस्कृति की रक्षा के लिए हिन्दुओं का संगठित होना अति आवश्यक है। जिन प्रदेशों व क्षेत्रों में हिन्दुओं की संख्या घटी है वहाँ भारत कमजोर हुआ है। देश के किसी भी कोने से पलायित होना उनके संगठन को कमजोर बनाता है। हिन्दू धर्म में अनेकों देवताओं के होने के बावजूद एक ही है यह बताया गया है। हिन्दू धर्म केवल एक धर्म ही नहीं अपितु सम्पूर्ण मानव जाति को मानव जीवन जीने की पद्धति सिखाता है। हमें अपने मत मतान्तों का त्याग कर वेदों में वर्णित तथा रामायण में स्थापित आदर्शों का विस्तार करना चाहिए। स्वामी श्री रामकमलदास वेदांती ने देश व विदेश के विभिन्न क्षेत्रों में संस्थाएं स्थापित कर जो वैदिक धर्म का प्रचार किया उसके लिए वे सदैव प्रशंसनीय रहेंगे। सुदामा कुटी वृन्दावन से पधारे हुए मद जगद्गुरु नाभा द्वाराचार्य सुतीक्ष्णदास महाराज ने कहा कि अखिल कोटि ब्रह्माण्ड नायक परमात्मा मानव के रूप में धरती पर अवतार लेकर कोल-भीलों के प्रेम को स्वीकार करते हैं। इश्वर की प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ साधन प्रेम ही है। मनुष्य का जीवन क्षणभंगुर है। यह व्यर्थ न हो जाए इसलिए हमें ईश्वर की उपासना करते रहना चाहिए। लाल घाटी गुफा मंदिर के श्री महंत रामप्रवेश शास्त्री महाराज ने कहा कि भक्तमाल में दो ही भजने के योग्य हैं या तो इश्वर या फिर इश्वर के भक्त संत जन । राम से भी ज्यादा राम के भक्तों का महत्व है। इसलिए भगवान राम से भी ज्यादा हनुमान की पूजा की जाती है। फगवाड़ा (पंजाब) से पधारे हुए महंत नरहरी दास महाराज ने कहा कि सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। इसी सेवा के बल पर श्री हनुमान जी संसार में पूजे जाते हैं। उन्होंने कहा कि आज संस्कृत भाषा वैज्ञानिक भाषा है। इसलिए संस्कृत का विस्तार होना चाहिए। वेदान्त आश्रम में स्थापित संत जगन्नाथदास संस्कृत विद्यालय में पढ़ रहे छात्र संस्कृत भाषा के सशक्तप्रहरी बनकर अपने राष्ट्र व धर्म दोनों की रक्षा करेंगे ऐसा मुझे विश्वास है। स्वामी रामकमलदास वेदांती महाराज ने मंच का संचालन करते हुए पधारे सभी अथितियों व संतों का स्वागत करते हुए कहा कि गंजबासौदा व क्षेत्र के सहयोग से वेदान्त आश्रम अपनी संस्कृति व संस्कृत भाषा के संरक्षण में सदैव कटीबद्ध रहेगा ।

रामायण में वर्णित राक्षस आज भी हमारे जीवन में बैठे हुए हैं डां वेदांती

समापन के दिवस में श्री राम कथा के सार्थक का वर्णन करते हुए श्री मद जगद्गुरु अनंतानंद द्वाराचार्य डॉ. रामकमलदास वेदांती महाराज ने कहा कि रामायण में वर्णित राक्षस आज भी हमारे जीवन में बैठे हुए हैं। जब तक हम अपनी साधनाओं के द्वारा उन्हें मन नहीं देते तब तक हमारे जीवन में सुख शान्ति की स्थापना नहीं होगी। स्वामी जी ने रावण को मोह, कुम्भकरण को अहंकार तथा मेघनाद को कामनाओं का प्रतीक बताया है। उन्होंने कहा कि हम संसार को सुधारने का प्रयत्न करते हैं किन्तु अपने अन्दर छुपी बुराइयों को मारने का प्रयत्न नहीं करते। दूसरों को दुःख देने वाले राक्षस एक न एक दिन मरते ही हैं। अपने को अजर-अमर समझने वाले रावण और कुम्भकरण व मेघनाद जैसे दैत्य मारे गए। उनके पुतले आज भी देश में ही नहीं विदेशों में भी जलाए जाते हैं। स्वामी श्री वेदांती जी ने कहा कि मनुष्य को दो चीजें सदैव याद रखना चाहिए पहली मृत्यु तथा दूसरा इश्वर जो मृत्यु और इश्वर को याद रखते हैं वे अपना समय कभी बर्बाद नहीं करते। रावण को मारकर भगवान राम अयोध्या वापिस लौटे और उनका राज्याभिषेक किया गया। भगवान राम का राज्य आज भी आदर्श के रूप में माना जाता है। श्री राम ने अयोध्या में जो राजघाट बनाया उस पर बगैर किसी भेदभाव के सभी जातियों के लोग स्नान करते थे। राम के राज्य में हर एक माता-पिता अपने बच्चों को भगवान राम के आदाशों पर चलने की प्रेरणा देते थे। किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था। प्रकृति हरी-अरी तथा जल निर्मल था। सभी लोग सुशिक्षित व परस्पर प्रेम रखने वाले थे। जैसा राजा होता है वैसी ही प्रजा होती हैं। इसलिए चरित्रवान भगवान राम ने अपनी सारी प्रजा को चरित्रवान बनने की प्रेरणा दी थी। चरित्रहीन व्यक्ति जीते जी मरे के सामान है। हमें श्री राम के मंदिर में श्री राम का दर्शन करके चरित्रवान बनने का संकल्प लेना चाहिए।